Thursday, 27 October 2011

Vedna


पर्यावरण प्रेम की भावना का महत्त्व देश प्रेम की भावना से हमेशा ऊपर रहना चाहिए, जिसे हम मानवता कहते है. देशप्रेम की भावना जरुरी है पर पर्यावरण प्रेम की भावना सरहदों से परे की भावना है. मानवीय प्रेम की भावना का एहसास माँ अपने बच्चे को कराती है. धीरे वह समझता है की पेड़ की छाया क्यों जरुरी है...सांस लेने में ओक्स्य्गें का महत्त्व क्या है. पानी का क्या महत्त्व है? इत्यादी.मानवीय प्रेम के अनेक रूप है जिनसे हम अनभिज्ञ नहीं हैं..पर पर्यावरण प्रेम सर्वोपरि है..पर्यावरण के चीर हरण एवं प्रदुषण से मानव का ही दम घुटता है...कल दीपावली पर हम सभी ने हजारों रुपये के पटाखों को धुंए में उदा दिया और उसके बाद खुश भी हो लिए पर इससे हमारे पर्यावरण को कितना नुक्सान हुआ ये शायद नहीं सोचा होगा,,बहुत से लोग तो ये भी कहते है की जो होगा देखा जायेगा,,
21 शताब्दी के पर्यावरण रूपी प्रसार के सर्पदंश ने डस लिया  है.. दिशाहीन प्रगति का मानव को एहसास हो रहा है...! मानवीय आर्जुयों ने ही उसे शिकंजे में जकड लिया है..!प्रगति की दिशाहीनता तन मन को जला रही है - ओजोने होल एवं ग्लोबल वार्मिंग की समस्या...स्वच्छ पानी को तरसा रही है.....शायद विष्णु, ब्रह्मा, महेश मंत्रणा कर कर के थक गए है एवं मानवता की विकत भूख देख कर...असहाय नज़र आते है...अथय पानी, समुन्दर ही समुन्दर, फिर भी पृथ्वी प्यासी, प्यास भुजाने के लिए बादल भी बरखा ऋतू में बादलों में पानी भर लाने को तरस जाते है...
सच है जब बादल पानी को तरसे....तो मानव पानी कहाँ पाए...!!!वन उपवन प्यासे रह जाये .. आज कृष्ण जी  को भी दुविधा नजर आती है जमुना तीर जाने को ...