Thursday, 10 November 2011

पतझड़

पत्तों का बिछड़ना पतझड़ में 
अपने में इक अफसाना है 
किसने कहा,किसने है सुना 
कहने वाला दीवाना हैं.......!

पतझड़  में पत्तों का पिलापन
पत्तों की कहानी कहता है 
मौसम के आते जाते ही 
कुछ हँसता है कुछ रोता है 
पतझड़ तो आना जाना था 
कहना वाला दीवाना था 
पत्तों का बिछड़ना पतझड़ में  
अपने  में इक अफसाना था 
पतझड़ का मौसम आते ही 
कुछ फूल खिले ,कुछ मुरझाये 
पतझड़ में खिलने वाले फिर 
खिल खिल कर कुछ मुस्काए 
कुछ खिल -खिल कर कुछ मुस्काए 
कुछ खिल- खिल कर खूब हँसे 
जब भँवरे उन पर मंडराए 
पतझड़  ने भी तो रंग दिखाना था 
फूलों  का रंग सुहाना था 
फूलों का रंग सुहाना था 
पतझड़ में फूलों का खिलना भी 
अपने में इक अफसाना था 
किसने कहा किसने है सुना 
कहने वाला दीवाना है  
पतझड़ के मौसम सा सूनापन 
फिर तेरे मुखड़े पर छाया
जो मिलने आने वाला था 
वो कहकर भी वादे पर जब न आया 
पतझड़ तो आना जाना था 
न आने वाले न आना था 
पत्तों का बिछड़ना पतझड़ में 
अपने में इक अफसाना था 
फिर सर्द हवाए आ पहुंची 
फिर याद भी उनकी आ पहुंची 
पतझड़ के पीले पत्ते भी 
दामन में है 



ओजोन परत की ओट से झाँकता सूरज

ओजोन परत की ओट 
से झाँकता सूरज हर दिन हर पल !     

उभरता सूरज सुबह छितिज़ से ,
डूबता सूरज दूर छितिज़ में,

सुबह की लालिमा बिखेरता सूरज,
ऊर्जा की भेंट दे कर,
शाम की लालिमा में लुप्त होता सूरज !

हँस-हँस के ग्रहणों से जूझता सूरज ,
चाँद सितारों को प्रकाश  ऊर्जा प्रदित करता सूरज ,
धरती पर बढ़ती इंसानी घृणा को झेलता सूरज ,
अपनी बढती तपिश का अहसास कराता सूरज !

धरती के हालात पर करुणा प्रकट करता सूरज 
भटके हुए प्राणी जगत को राह दिखाता सूरज,
मुहब्बत की तपिश से पिघलता सूरज ,
ओजोन परत की ओट से झाँकता सूरज ,
ओजोन छिद्र की  महिमा का अहसास कराता सूरज ,
21वीं सदी में प्राणी जगत को राह दिखाता सूरज 

चेतनहीन मनुष्य की चेतना जगाता सूरज 
ओजोन परत की ओट से झाँकता  सूरज 
प्राणी जगत का रखवाला सूरज !   


  







और फिर यादों का सफर बाकी है.......

यादें  जो फिर लौट आई  है सताने को ,
यादें  जो फिर अहसास करायेगी तन्हाई का ,             
यादें जो फिर साथ चलेंगी हम सफर बनकर ,
यादें जो फिर दिल को दामन थाम लेंगी हर कदम पर,
यादें जो फिर जलाएँगी मुहब्बत की शमा ,
यादें जो फिर याद करेंगी ,तुझको हर करवट ,हर पल         
यादें जो फिर दिल का सुंकू ले जाएँगी ,
यादें जो फिर दिल को बहलायेंगी तन्हाई में,


हाय वा तेरे लौट के आने का अहसास ,
फिर तुझे छू के आएगा एक हवा का झोंका,
और फिर ख जायेगा अनकही बाते तन्हाई में
वो तेरी यादें जो ले जाएँगी  दूर बहुत दूर

तुझको अहसास हो कि न हो चाहत का फिर भी 
हम तेरी यादों में दूर ,बहुत दूर चले जायेंगे ,
और फिर यादों के सफर से उभर ना पाएंगे ,
लौट कर फुरसत में लौट-लौट आएँगी,
और फिर इक और यादों का सफर बाकी है........!  
  


                    

डूबता चाँद ...उभरता चाँद

डूबता चाँद .........उभरता चाँद
दूर कहीं दूर छितिज में
डूबता चाँद उभरता चाँद                   
प्रेमी मन की आस का चाँद 

आस प्यार की साथ -साथ  
निशा रानी भी हो कर हताश -फिर चांदनी में 
उमा को है रह -रह खोजती ,
जलज ,अंबुज,सरोज  मिल सब 
सरोवर में तुझको खोजते ,
खी का करें हर पल इंतजार 
हो के लाचार.........

कभी तरुवर की छाव में ....
कभी नदिया के पार.......
इंतजार और खामोश मुहब्बत का खेल 
देखता चाँद .......!

डूबता चाँद उभरता चाँद....
चांदनी रात में निशा रानी की गोद में 
उमा की ज्योति को खोजता चाँद 
तलखिये  हालात को एक मुहब्बत से 
टकटकी लगाये देखता चाँद 
डूबता चाँद ........उभरता चाँद !



फिज़ा मेरे देश की

फिजाँ मेरे देश की ,फिजाँ मेरे देश की
अनकहे रंगों में लिपटी 
तंगदिली के आलम में सिमटी
फिर भी खुशनुमा चेहरों में चमकें 
फिजाँ मेरे देश की ..........

देश में, परदेश में रहते है हम 
मिट्टी जहाँ की एक है ,मिट्टी जहाँ की एक है,
देश मेरा..........!!देश मेरा ...............!!
खून तेरा...........!!खून तेरा ............!!
बंदूक में गोलियों  की गिनती ...........
एक नही अनेक है ,
फिजाँ मेरे देश की............

खून का रंग सब एक है ,
पर दिलजले भी अनेक है ,
कोई सोचे ,कोई समझे  हैं वो कितने ...........!!
रंग को बदरंग कर दें ,कम नहीं अनेक हैं !
फिजाँ मेरे देश की........................

दिलजलों से कोई पूछे ............
दिल जलाते हों क्यों कर भला ............!!
दिल लगाना सीख लो..............
कुछ गुल खिलाना सीख लो .......
देश की हर फिजाँ को खुशनुमा बनाना सीख लो 
फिजाँ मेरे देश की...............  




  








                             





Wednesday, 9 November 2011

पर्यावरण दिवस - 5 जून

पर्यावरण दिवस - 5 जून- हर वर्ष  हमने मनाया,
कभी जल निधि को दी आवाज ............!
कभी कटे जंगलो -पेड़ों  की कमी को आधार बनाया........!
तरह -तरह के गीत गा कर -धरती माँ के जख्मों को सहलाया ............!
पेड़ काटने फिर भी न छोड़े..........,

पानी भी जी भर कर फैलाया........,
जनता जनार्दन रही बढ़ती हर पल........,
इंसानी जरूरतों का हल - प्राणी फिर भी कर न पाया !
सभी धर्मो के देवता हुए हतप्रभ ,
प्राणी जगत पर्यावरण  की वेदना  - फिर भी समझ न पाया,
 जब -जब  धरती ने कर्वट बदली ........,
और सुनामी सा रूप अपना दिखाया , 
पर्यावरण बचाओ ............पर्यावरण बचाओ............

चिल्लाया  फिर प्राणी ..........,
पर यह नशा फिर रहा कुछ दिन ही सीमित............
फिर वर्ष बीता...........नया वर्ष आया 
पर्यावरण  दिवस - 5 जून फिर  हमने मनाया,
............................फिर  हमने मनाया!



Saturday, 5 November 2011


पर्वत ,झरने ,पेड़ और पंछी

पर्वत ,झरने ,पेड़  और पंछी,
कुछ खुशगवार लम्हें सजो रहे हैं 
"कुछ खुशगवार यादें ............"
"कुछ खुशगवार चेहरे............"
"कुछ खुशगवार पहलु ..........."
"कुछ मिल के संग साथी........."
"सपने संजो रहे हैं.................."
"कुछ है की लम्हा -लम्हा........."
"हम पा के खो रहे हैं ............"
"पर्वत ,झरने ,पेड़, और पंछी फिर भी"
कुछ खुशगवार लम्हें संजो रहे हैं !
".............लम्हें संजो रहे है !"


दीमक....

चल  उठा  भाग,
मैं आया तुझको खाने ,
लोग कहें मैं चाटूं सबको,
दीमक बन प्रेम रोग लग जाये ,
पर मेरा प्रेम प्रभु प्रेम है भाई ,
जो कोई समझ न पाए ,
मीरा कहे प्रेम रोग अति मीठा ,
जो प्रभु चरनन में समाये ,
मुझ दीमक का,कोऊ दर्द न जाने ,
मुझको सब भाये!
मेरा मेरा करता फिरे ये प्राणी ,
इसका सब कुछ मुझ में समाये !
   

माँ मेरी ......

माँ मेरी ,
दे के सबक ,प्यार का ..........,
खो गई फिर राह में ,
राह मेरी अंजान थी,
राह वो दिखलाती रही ,
हम कदम पर था अँधेरा ,
रोशनी वो दिखलाती रही ,
कर दिया बेचैन दिल ने ,
दिल को वो समझाती रही ,
था सफर -लम्बा सफर ,
साथ वो आती रही ,
हर भटकती राह में ,
राह वो दिखलाती रही ,
माँ मेरी ,
दे के सबक प्यार का..........,
फिर याद करवाती रही ,
कमल कहकर ,जोत कहकर,
ज्योति कह कर -बुलाती रही ,
प्यार वो दिखलाती रही ,
चुपके चुपके सहलाती रही,
माँ मेरी ,
देकर सबक प्यार का ......,
भटके  को राह दिखलाती रही!   

....का भर लायुं जमुना से मटुकी

......का भर लायुं जमुना से मटुकी....
जब जब जायुं मैं जमुना तीरे ...मटुकी भरने को,
हाय .....राम.... मैं अटकी ...मटकी....,
मटुकी, पाँव कीचड़ में अटके....,

फिर का भर लायुं, जमुना से मटुकी....,
जमुना तीर अब मोहे दर लागे......,
श्याम मनोहर भी अब न बुलाये, पिचेई या आगे....
मन न भर आये......, अब मोहे कछु न भये,
जमुना तीर बदलता जाए...,

मटुकी सुनी....डगर मोरी सूनी...,
तो का भर लाती.... जमुना से मटुकी................


वन उपवन में रहें हम....वृक्ष सुख पायें

वन उपवन में रहें हम....वृक्ष सुख पायें,
वृक्ष सुख सोचें... अब कहाँ वृक्ष सुख पायें...?
कटते वृक्ष....खडा मानव मूक द्रष्टा बन !!,
वन उपवन भी कटते जाएँ.....!!!!
वन उपवन में रहें हम....वृक्ष सुख पायें....

मानव मन फिर कहाँ वृक्ष सुख पायें ?
वृक्ष सुख मिले जहाँ हों वृक्ष अनेक,
वृक्ष सुख मिले जहाँ हों वन उपवन की टेक,
वन उपवन में रहें हम....वृक्ष सुख पायें....

दूरियां ही दूरियां.........

दूरियां ही दूरियां ,
रखते हो अकसर दूरियां 
दूरियां है राह में ,                                             
यूँ रहते हो हम से दूर तुम                                                            
दूरियां को तोड़ दो ,
अब दूर कर दो दूरियां
दूरियां से प्यार है ,
कुछ और जो बड़ने लगा
बच के रहना  दूरियां  से ,
फासला है मिटने लगा 
सपनो में हो आने लगे,
 दूरियां  हो मिटाने लगे 
 दूरियां कहने को अब ,
 बस रह जाएँगी  दूरियां 
 दूरियां ही  दूरियां हैं ,
प्यार में बस  दूरियां ! 
   

फूलों की जिंदगी.........

फूलों  की जिंदगी होती है  थोड़ी 
ये  खिलते हैं कभी,कभी खिलते ही नहीं 
कहाँ है ,कहाँ है अरमान  इनके लिए
बस पल -पल मचलते हैं 
यह अभी हैं ,अभी नहीं ,अभी कुछ और 
रुक के खिलते हैं 
जाने अनजाने  में बस इनसे दिल लग जाता है
दिल में चंपा ,चमेली ,जूही ,गुलाब खिल जाता है   
गुजर बसर फिर इक ख्वाब में बदल जाता है  
इनसे दिल लगाने का मजा भी बहुत आता हैं!
उम्मीदों का इक फूल खिलता है ,इक मुरझा जाता है
हर फूल फिर सुन्दरता बिखेरने का वादा कर 
मुरझा जाता है !
हर फूल यादों में कांटा बन कहीं चुभ जाता है !
फूलों की खोज में फिर हर ओर
कांटा ही कांटा नजर आता है !
फिर इस चाहत की राह में
चाहत का अनोखा नजारा नजर आता है !
फूल फिर भी फूल है !
जो यादों में रह-रह कर लहराता है !
भवरों को बुला के मुस्कुराता है !
फूलों  की जिंदगी का अहसास कराता है !
  

बादल बदले देख जमाना.........

अब बारिश भी आती है रातों में ,
आती शरमाती है रातों में ,
अपना एहसास  कराये  रातों में ,

सुबह शाम घिर आये बादल,
लोगों क भरमायें बादल,
धुएं से घबराएँ बादल,

गड्ढो से गुजरता देख  मुसाफिर ,
शरमा के बस रह जाये बादल.
रात हुई फिर आयें बादल,

सड़के , खेत न भर पायें बादल,
चुपके  से उड़ जाये बादल,
कब बरसें ,जल थल हो घर -बाहर,

प्यासी  धरती ,प्रेमी  मन को ,
क्या कर यूँ तरसायें  बादल ,
बारिश की चाहत  वालों  को,

कब तक यूँ तड़पायें बादल,
हम चाहें जल भर रख लें ,
प्यास बुझायें अमृत रस चख लें ,

मन मेंयूँ रहें समाये बादल,
मन कहे नजारा हो दिन में ,
फिर सात रंग दे जाये बादल,

बादल बदले  देख जमाना ,
भूल गये अब जल भर लाना ,
पर बादल का दर्द है किसने जाना ,

कोई उनकी भी सुने लगा के मन ,
कहने को है बादल बदल गये,
बदला है  जमाना बादल बदल गये,

चारों ओर प्रदुषण , धुँआ ,
चारों ओर प्रदुषण  जल ,
बादल भागे ढूढे वन, ढूढे उपवन 

फिर मधुर पवन को तरसे मन,
बादल भागे सुन कोयल -बुलबुल केपुरार 
बादल भागे सुन गीद-कौओं की चीतकार,

बादल फिर भटके रेगिस्तानों  में ,
फिर कहाँ से भरके लाते जल ,
देखी फिर मानव की भूख विकत ,

बादलों की भी गई भ्रकुटी सिमट ,
कहनों को हम बादल बदल गये,
बदला  है जमाना बदल गये ,

हम भूल गये ,हम भटक गए ,
फिरा मिला जहाँ ,जितना है मिला ,
हम बादल में हैं भर लाये जल ,

बादल बदले देख जमाना ,
भूल गये अब जल भर लाना ,
बारिश का है अब ये अफसाना ,

कब हो आना कब हो जाना ,
मानव को है बस अब पछताना ,
बादल बदले देख जमाना ,

भूल गये अब जल भर लाना ,
बादल बदले देख जमाना !





      

   

Friday, 4 November 2011

धरती धर्म निभाये..........

आओ धरती  धर्म  निभाये ,
शहर आगरा के वातावरण  को सुंदर  स्वच्छ  बनाये
घनी छाया हो नीम की अपनी -मिले गुलमोहर की लाली
अमलतास लाये बसंत सी आभा -मन निर्मल हो जाये ,
आओ हम सब मिल जुल कर धरती धर्म निभायें 
  आओ पेड़ लगाये ...........आओ पेड़ लगाये !  
वर्षा के पानी का करें संचय हम सब ,
कूड़ा कचरा न फैलाएं  हम सब,
 शहर हमारा -पार्क उद्यान हमारे -लगे सुहाने ,
हर प्राणी -हर नागरिक फिर बने इनके दीवाने,
दूर देश से आने वाला ,बार -बार फिर आये ,
शहर आगरा का गुणगान  करें हर कोई
जो भी यहाँ से जाये ............
आओ हम सब मिल जुल कर धरती धर्म  निभायें
 नया युग है नया सपना ,
हर घर है अब बाग सा अपना ,
पूरा हो इसके उपचार का सपना ,
हर नागरिक फिर सजग हो अपना ,
आओ मिल सब गायें...........
आओ धरती  धर्म  निभायें ...........
शहर आगरा के वातावरण  को सुंदर  स्वच्छ  बनायें !