Saturday, 5 November 2011

बादल बदले देख जमाना.........

अब बारिश भी आती है रातों में ,
आती शरमाती है रातों में ,
अपना एहसास  कराये  रातों में ,

सुबह शाम घिर आये बादल,
लोगों क भरमायें बादल,
धुएं से घबराएँ बादल,

गड्ढो से गुजरता देख  मुसाफिर ,
शरमा के बस रह जाये बादल.
रात हुई फिर आयें बादल,

सड़के , खेत न भर पायें बादल,
चुपके  से उड़ जाये बादल,
कब बरसें ,जल थल हो घर -बाहर,

प्यासी  धरती ,प्रेमी  मन को ,
क्या कर यूँ तरसायें  बादल ,
बारिश की चाहत  वालों  को,

कब तक यूँ तड़पायें बादल,
हम चाहें जल भर रख लें ,
प्यास बुझायें अमृत रस चख लें ,

मन मेंयूँ रहें समाये बादल,
मन कहे नजारा हो दिन में ,
फिर सात रंग दे जाये बादल,

बादल बदले  देख जमाना ,
भूल गये अब जल भर लाना ,
पर बादल का दर्द है किसने जाना ,

कोई उनकी भी सुने लगा के मन ,
कहने को है बादल बदल गये,
बदला है  जमाना बादल बदल गये,

चारों ओर प्रदुषण , धुँआ ,
चारों ओर प्रदुषण  जल ,
बादल भागे ढूढे वन, ढूढे उपवन 

फिर मधुर पवन को तरसे मन,
बादल भागे सुन कोयल -बुलबुल केपुरार 
बादल भागे सुन गीद-कौओं की चीतकार,

बादल फिर भटके रेगिस्तानों  में ,
फिर कहाँ से भरके लाते जल ,
देखी फिर मानव की भूख विकत ,

बादलों की भी गई भ्रकुटी सिमट ,
कहनों को हम बादल बदल गये,
बदला  है जमाना बदल गये ,

हम भूल गये ,हम भटक गए ,
फिरा मिला जहाँ ,जितना है मिला ,
हम बादल में हैं भर लाये जल ,

बादल बदले देख जमाना ,
भूल गये अब जल भर लाना ,
बारिश का है अब ये अफसाना ,

कब हो आना कब हो जाना ,
मानव को है बस अब पछताना ,
बादल बदले देख जमाना ,

भूल गये अब जल भर लाना ,
बादल बदले देख जमाना !





      

   

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