अपने को धरती के मालिक कहलाने वाले
वाह ! वाह ! रे इन्सान ........!
तू इन्सान है या शैतान ..........!
सब कुछ तो तू खाए जा रहा हैं !
धरती माँ को तू किस तरफ ले जा रहा है !
धर्म ,जाति,बिरादरी वाद में लिप्त
आने वाले तूफान से अंजान
संतो की वाणी का न करें जरा भी ध्यान
पवन ,पानी ,वनस्पति का जी भर करें नुकसान
सबका मजहब है महान,
इक दूजे की जान लेने का है बस अरमान
सब का देश है महान
पर मेरी धरती जल निधि है महान
जो पल रही है इन्सान
कहने को जो बनता जाये शैतान
वाह! वाह ! रे धरती के मालिक
तू करता जाये अपनी बर्बादी का आहवन
तू सचमुच में बनता जाये महान
वाह ! वाह ! रे इन्सान ........!
तू इन्सान है या शैतान ..........!
सब कुछ तो तू खाए जा रहा हैं !
धरती माँ को तू किस तरफ ले जा रहा है !
धर्म ,जाति,बिरादरी वाद में लिप्त
आने वाले तूफान से अंजान
संतो की वाणी का न करें जरा भी ध्यान
पवन ,पानी ,वनस्पति का जी भर करें नुकसान
सबका मजहब है महान,
इक दूजे की जान लेने का है बस अरमान
सब का देश है महान
पर मेरी धरती जल निधि है महान
जो पल रही है इन्सान
कहने को जो बनता जाये शैतान
वाह! वाह ! रे धरती के मालिक
तू करता जाये अपनी बर्बादी का आहवन
तू सचमुच में बनता जाये महान
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