आँख का पानी है की दरिया बनकर ,
दर्द होता है तो चल निकलता है .....,
दर्द हो सूखे पेड़ का या जंगल के शेर का,
या मदभरी चांदनी मैं .......
इक चाहत के हेर -फेर का ........
ये संभलता ही नही ........आँख का पानी ........
चल निकलता हैं ...........
वो जो वादा कर गये, लौट के आयेंगे ........
बरसात की बदली बनकर ..............
उम्मीदों की कलियाँ को दे गये आस ......
बसंत के फूलों की तरह खिलने की ...........
हाल बेहाल हैं उन उम्मीदों का
और जूही ,चंपा ,चमेली की कलियों का
कोई भी फूल खिलता नही ......
आँख का पानी हैं की बरसात के वादों पर ............
दर्द बन के चल निकलता हैं .......
दर्द वादे से हैं जो जाकर जुड़ा
चन्द बरसात की बूंदों से
फिर और उभर आता हैं ............
शायद बरसात का बदल और बदलो को
संग लेन से घबराता हैं ..........
तरसती आँखे कुदरत का नजारा देखें
कि तू आ जाये घनघोर काली घटा बनकर
चन्द घडियो के लिए सपनों में भी छा जाएँ
मेरी बेचैनी मेरी तन्हाई को मिटा जाये
दर्द को भूल कर आँख के दरिया को बहने दूंगा
आँख का पानी है बरसात के वादे पर चल निकलता हैं ......!
ओं बरसात के घिर आयें घनघोर बादलों
सुनों कोयल -बुलबुल कि पुकार
बुझाओ प्यास प्यासी धरती की
न रहे अधूरी अब और पल भर भी
न रहे अधूरी आस अब फूलों के खिलने की
बंद कलियाँ खिल जाएँ तन्हाई में ,सपनो में
बरसात के पानी को भर के रख लूँगा अंखियो में
संग सजो लूँगा तेरी चाहत .....दर्द को सह लूँगा
आँख का पानी है ......!
वो जो रब ने दिया है बहुत प्यारा है
न खोने दूंगा ......!
वो तेरा नूर .......तेरी याद इक कारवां की तरह
सूर्य किरणों के संग निकलती है
ग्रीष्म ऋतु की बड़ती हुई तपिश
शाम होते ही .......!
सूर्य किरणों के संग जा ढलती हैं
और रह जाती है इक तड़प
जो दर्द बनकर .......!
शाम होते ही दरिया बनकर ......
मेरी अंखियो से ,तेरी यादो के संग और
आँख के पानी संग ,भ निकलता है !
आँख का पानी है .........
सूखे पेड़,उजड़ती धरती का एहसास
मेरी यादों ,मेरे सपनों ,मेरी चाहत को
बे आवाज़ ,चुपचाप निगलता जाता हैं
जिस तरह दर्द सुबह में बिखरी धूप संग
और भी खिल क निखर आता है
और इक चंचल मतवाली तितली
नदिया की सूखी रेत पर ........
इठलाती चली आती हैं
और वही दासतां, सूखे पेड़ उजड़ती धरती की
अपने सूर्ख गालों की गहराई को सहला के
शर्मा के मुझे सुनाती हैं
कुछ अनकहे राज़,अपनी चाहत अपनी मुहब्बत के
अंखियो में ,जानें क्यों कुछ -कुछ छुपाती हैं
आँख का पानी हैं जो इस बेबसी में
दरिया बनकर ,दर्द देकर फिर बह निकलता हैं
फिर वही जाना पहचाना दर्द का एक एहसास
नई दिशाओं की ओर चल निकलता है
आँख के पानी के संग ,दर्द का एहसास
फिर साथ -साथ चलता हैं .......!
आँख का पानी हैं ..........!
दर्द होता है तो चल निकलता है .....,
दर्द हो सूखे पेड़ का या जंगल के शेर का,
या मदभरी चांदनी मैं .......
इक चाहत के हेर -फेर का ........
ये संभलता ही नही ........आँख का पानी ........
चल निकलता हैं ...........
वो जो वादा कर गये, लौट के आयेंगे ........
बरसात की बदली बनकर ..............
उम्मीदों की कलियाँ को दे गये आस ......
बसंत के फूलों की तरह खिलने की ...........
हाल बेहाल हैं उन उम्मीदों का
और जूही ,चंपा ,चमेली की कलियों का
कोई भी फूल खिलता नही ......
आँख का पानी हैं की बरसात के वादों पर ............
दर्द बन के चल निकलता हैं .......
दर्द वादे से हैं जो जाकर जुड़ा
चन्द बरसात की बूंदों से
फिर और उभर आता हैं ............
शायद बरसात का बदल और बदलो को
संग लेन से घबराता हैं ..........
तरसती आँखे कुदरत का नजारा देखें
कि तू आ जाये घनघोर काली घटा बनकर
चन्द घडियो के लिए सपनों में भी छा जाएँ
मेरी बेचैनी मेरी तन्हाई को मिटा जाये
दर्द को भूल कर आँख के दरिया को बहने दूंगा
आँख का पानी है बरसात के वादे पर चल निकलता हैं ......!
ओं बरसात के घिर आयें घनघोर बादलों
सुनों कोयल -बुलबुल कि पुकार
बुझाओ प्यास प्यासी धरती की
न रहे अधूरी अब और पल भर भी
न रहे अधूरी आस अब फूलों के खिलने की
बंद कलियाँ खिल जाएँ तन्हाई में ,सपनो में
बरसात के पानी को भर के रख लूँगा अंखियो में
संग सजो लूँगा तेरी चाहत .....दर्द को सह लूँगा
आँख का पानी है ......!
वो जो रब ने दिया है बहुत प्यारा है
न खोने दूंगा ......!
वो तेरा नूर .......तेरी याद इक कारवां की तरह
सूर्य किरणों के संग निकलती है
ग्रीष्म ऋतु की बड़ती हुई तपिश
शाम होते ही .......!
सूर्य किरणों के संग जा ढलती हैं
और रह जाती है इक तड़प
जो दर्द बनकर .......!
शाम होते ही दरिया बनकर ......
मेरी अंखियो से ,तेरी यादो के संग और
आँख के पानी संग ,भ निकलता है !
आँख का पानी है .........
सूखे पेड़,उजड़ती धरती का एहसास
मेरी यादों ,मेरे सपनों ,मेरी चाहत को
बे आवाज़ ,चुपचाप निगलता जाता हैं
जिस तरह दर्द सुबह में बिखरी धूप संग
और भी खिल क निखर आता है
और इक चंचल मतवाली तितली
नदिया की सूखी रेत पर ........
इठलाती चली आती हैं
और वही दासतां, सूखे पेड़ उजड़ती धरती की
अपने सूर्ख गालों की गहराई को सहला के
शर्मा के मुझे सुनाती हैं
कुछ अनकहे राज़,अपनी चाहत अपनी मुहब्बत के
अंखियो में ,जानें क्यों कुछ -कुछ छुपाती हैं
आँख का पानी हैं जो इस बेबसी में
दरिया बनकर ,दर्द देकर फिर बह निकलता हैं
फिर वही जाना पहचाना दर्द का एक एहसास
नई दिशाओं की ओर चल निकलता है
आँख के पानी के संग ,दर्द का एहसास
फिर साथ -साथ चलता हैं .......!
आँख का पानी हैं ..........!
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