अब बारिश भी आती हैं रातों में ,
आती शर्माती हैं रातों में ,
अपना एहसास कराएँ रातों में ,
सुबह शाम घिर आयें बादल,
लोगों को भरमायें बादल ,
धुयें से घबरायें बादल
गड्ढो से गुजरता देख मुसाफिर ,
शरमा के बस रह जायें बादल ,
रात हुई फिर आयें बादल ,
सड़के, खेत न भर पायें बादल ,
चुपके से उड़ जायें बादल ,
कब बरसे ,जल थल हो घर -बाहर,
प्यासी धरती ,प्रेमी मन को ,
क्या कर यूं तरसाए बादल ,
बारिश की चाहत वालों को
कब तक यूं तडपाये बादल ,
हम चाहें जल भर रख लें ,
प्यास बुझायें अमृत रस चख लें ,
मन में यूं रहें समायें बादल ,
मन कहे नजारा हो दिन में ,
फिर सात रंग दे जायें बादल ,
बादल बदलें देख जमाना ,
भूल गएँ अब जल भर लाना ,
पर बादल का दर्द हैं किसने जाना ,
कोई उनकी भी सुने लगा के मन ,
कहने को है बादल बदल गए !
बदला है जमाना बादल बादल गयें,
चारों ओर प्रदुषण ,धुंआ ,
चारों ओर प्रदूषित जल ,
बादल भागे दुढ़े वन ,दुढ़े उपवन
फिर मधुर पवन को तरसे मन ,
बादल भागे सुन कोयल -बुलबुल केपुरार
बादल भागे सुन गीद-कौओ की चीतकार,
बादल फिर भटके रेगिस्तानो में ,
फिर कहाँ से भर के लातें जल ,
देखी फिर मानव की भूख विकट,
बादलो की भी गयी भ्रकुटि सिमट ,
कहनो को हम बादल बादल गयें ,
बदला है जमाना बदल गयें,
हम भूल गयें ,हम भटक गयें ,
फिरा मिला जहाँ ,जितना है मिला ,
हम बादल में हैं भर लाये जल ,
बादल बदलें देख जमाना ,
भूल गयें अब जल भर लाना ,
बारिश का हैं अब यें अफसाना ,
कब हो आना कब हो जाना ,
मानव को है बस अब पछताना ,
बादल बदलें देख जमाना ,
भूल गयें जब जल भर लाना ,
बादल बदलें देख जमाना !
आती शर्माती हैं रातों में ,
अपना एहसास कराएँ रातों में ,
सुबह शाम घिर आयें बादल,
लोगों को भरमायें बादल ,
धुयें से घबरायें बादल
गड्ढो से गुजरता देख मुसाफिर ,
शरमा के बस रह जायें बादल ,
रात हुई फिर आयें बादल ,
सड़के, खेत न भर पायें बादल ,
चुपके से उड़ जायें बादल ,
कब बरसे ,जल थल हो घर -बाहर,
प्यासी धरती ,प्रेमी मन को ,
क्या कर यूं तरसाए बादल ,
बारिश की चाहत वालों को
कब तक यूं तडपाये बादल ,
हम चाहें जल भर रख लें ,
प्यास बुझायें अमृत रस चख लें ,
मन में यूं रहें समायें बादल ,
मन कहे नजारा हो दिन में ,
फिर सात रंग दे जायें बादल ,
बादल बदलें देख जमाना ,
भूल गएँ अब जल भर लाना ,
पर बादल का दर्द हैं किसने जाना ,
कोई उनकी भी सुने लगा के मन ,
कहने को है बादल बदल गए !
बदला है जमाना बादल बादल गयें,
चारों ओर प्रदुषण ,धुंआ ,
चारों ओर प्रदूषित जल ,
बादल भागे दुढ़े वन ,दुढ़े उपवन
फिर मधुर पवन को तरसे मन ,
बादल भागे सुन कोयल -बुलबुल केपुरार
बादल भागे सुन गीद-कौओ की चीतकार,
बादल फिर भटके रेगिस्तानो में ,
फिर कहाँ से भर के लातें जल ,
देखी फिर मानव की भूख विकट,
बादलो की भी गयी भ्रकुटि सिमट ,
कहनो को हम बादल बादल गयें ,
बदला है जमाना बदल गयें,
हम भूल गयें ,हम भटक गयें ,
फिरा मिला जहाँ ,जितना है मिला ,
हम बादल में हैं भर लाये जल ,
बादल बदलें देख जमाना ,
भूल गयें अब जल भर लाना ,
बारिश का हैं अब यें अफसाना ,
कब हो आना कब हो जाना ,
मानव को है बस अब पछताना ,
बादल बदलें देख जमाना ,
भूल गयें जब जल भर लाना ,
बादल बदलें देख जमाना !
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