Tuesday, 20 December 2011

सूख पेड़ कहे...."मानव बन "....वन मत छेड़

सूख पेड़ कहे...."मानव  बन "....वन मत छेड़
वन्य प्राणी घबराएँ  भागें .....
वन उपवन  फिर नजर ना आयें
वन पोखर वर्षा को तरसें
सूखा पेड़ कहे ....."मानव बन "....वन मत छेड़ !

शीशम , नीम , गुलमोहर ...सी शीतल काया ,                    
चिथड़े -चिथड़े .कर दी तूने...क्या पाया ,
वर्षा ऋतु तरसे वर्षा को ,
काली लट गोरी की तरसे ....बरखा को ....
होठ गुलाबी करें पुकार ......,
गाल कटोरें रहे निहार ......,
सावन की बूंदों को तरसे .....कब बरसे !! कब बरसे
हिरन से चंचल नैना कजरारे
सावन की बदली को रह रह निहारे

नीम सरीखे पेड़ पुकारें......
रोपो हमको रेगिस्तानो में .....
रोको रेगिस्तानो का फैलाव ,

सूखा पेड़ कहे ....जग जा हे मानव ....!!
सूखा पेड़ कहे ....."मानव  बन "...वन मत छेड़ !

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